पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार जो तस्वीर सामने आई, उसने लंबे समय से मजबूत माने जाने वाले किले को हिला कर रख दिया। इस बदलाव के केंद्र में रहे Amit Shah, जिनकी रणनीति और संगठन पर पकड़ को इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है।
करीब पंद्रह दिनों तक बंगाल में डेरा डालकर अमित शाह ने चुनाव प्रचार को सिर्फ रैलियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक मिशन की तरह चलाया। दिन में रैलियां और रोड शो, तो रात में लंबी रणनीतिक बैठकें यही उनका रूटीन बन गया था। हर बैठक में अगले दिन की योजना तैयार होती और उसे तुरंत जमीन पर उतारा जाता। 50 से ज्यादा रैलियों और रोड शो के जरिए उन्होंने न सिर्फ माहौल बनाया, बल्कि कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भी भरी।
चुनाव के दौरान किए गए वादे, जैसे सरकारी कर्मचारियों के लिए सातवां वेतन आयोग लागू करना और कानून-व्यवस्था पर सख्ती ने मतदाताओं के बीच स्पष्ट संदेश दिया। पहले चरण के मतदान के बाद अमित शाह का यह दावा कि बीजेपी 110 से ज्यादा सीटें जीत रही है, एक मनोवैज्ञानिक बढ़त साबित हुआ। इससे वोटर्स के बीच सत्ता परिवर्तन की संभावना मजबूत हुई।
हालांकि, यह पूरी रणनीति सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं थी। अमित शाह के साथ एक मजबूत टीम भी लगातार काम कर रही थी। Dharmendra Pradhan ने मुख्य रणनीतिकार के रूप में भूमिका निभाई और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संतुलन बनाया।Bhupender Yadav ने माइक्रो-मैनेजमेंट संभाला और बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत किया।